इकबाल कविताओं

चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया

चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया

चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया  चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया ख़ूने-सद नौबहार है दुनिया जान लेती है जुस्तजू  इसकी दौलते-ज़ेरे-मार है दुनिया ज़िन्दगी नाम रख दिया किसने मौत का इंतज़ार है दुनिया ख़ून रोता है शौक़ मंज़िल का रहज़ने-रहगुज़ार  है दुनिया

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी  मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी मक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी तेरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी हिजाब इक्सीर है आवारा-ए-कू-ए-मोहब्बत को मेरी आतिश को भड़काती है तेरी देर-पैवंदी गुज़र औक़ात...

है कलेजा फ़िग़ार होने को

है कलेजा फ़िग़ार होने को

है कलेजा फ़िग़ार होने को है कलेजा फ़िगार होने को दामने-लालाज़ार होने को इश्क़ वो चीज़ है कि जिसमें क़रार चाहिए बेक़रार होने को जुस्तजू-ए-क़फ़स है मेरे लिए ख़ूब समझे शिकार होने को पीस डाला है आसमाँ ने मुझे किसकी रह का ग़ुबार होने को क्या अदा थी वो जाँनिसारी में थे वो मुझपर निसार होने को वादा करते हुए...

तराना-ए-हिन्दी (सारे

तराना-ए-हिन्दी (सारे

तराना-ए-हिन्दी (सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा) उर्दू में लिखी गई देशभक्ति रचनाओं में शायद सबसे अधिक प्रसिद्ध यह रचना अल्लामा इक़बाल साहब ने बच्चों के लिए लिखी थी। यह सबसे पहले अगस्त 0 को इत्तेहाद नामक साप्ताहिक पत्रिका में प्रकाशित हुई और बाद में इक़बाल साहब के बांग-ए-दरा नामक संग्रह में तरान...

लेकिन मुझे पैदा किया उस

लेकिन मुझे पैदा किया उस

लेकिन मुझे पैदा किया उस देस में तूने इक वलवला-ए-ताज़ा दिया मैंने दिलों को लाहौर से ता-ख़ाके-बुख़ारा-ओ-समरक़ंद लेकिन मुझे पैदा किया उस देस में तूने जिस देस के बन्दे हैं ग़ुलामी पे रज़ामंद  

कभी ऐ हक़ीक़त-ए- मुन्तज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

कभी ऐ हक़ीक़त-ए- मुन्तज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

कभी ऐ हक़ीक़त-ए- मुन्तज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में  कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़र! नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में के हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं तेरी जबीन-ए-नियाज़ में तरब आशना-ए-ख़रोश हो तू नवा है महरम-ए-गोश हो वो सरूद क्या के छिपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ओ-साज़ में तू बचा बचा के न रख इसे तेरा आईना है वो आईना के ...

नसीहत

नसीहत

नसीहत बच्चा-ए-शाहीं से कहता था उक़ाबे-साल -ख़ुर्द ऐ तिरे शहपर पे आसाँ रिफ़अते- चर्ख़े-बरीं है शबाबअपने लहू की आग मे‍ जलने का काम सख़्त-कोशीसे है तल्ख़े-ज़िन्दगानीअंग-बीं जो कबूतर पर झपटने मे‍ मज़ा है ऐ पिसर वो मज़ा शायद कबूतर के लहू मे‍ भी नहीं  

हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम

हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम

हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा ख़िर्द के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तेरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं हर मुक़ाम से आगे मुक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं रंगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझसे हिजाब कि...

जब इश्क़ सताता है आदाबे-ख़ुदागाही

जब इश्क़ सताता है आदाबे-ख़ुदागाही

जब इश्क़ सताता है आदाबे-ख़ुदागाही  जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही खुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहंशाही ‘अत्तार’ हो ‘रूमी’ हो ‘राज़ी’ हो ‘ग़ज़ाली’ हो कुछ हाथ नहीं आता बे-आह-सहर-गाही नौमीद न हो इन से ऐ रह-बर-ए-फ़रज़ाना कम-कोश तो हैं लेकिन बे-ज़ौक़...

मुझे आहो-फ़ुगाने-नीमशब का

मुझे आहो-फ़ुगाने-नीमशब का

मुझे आहो-फ़ुगाने-नीमशब का  मुझे आह-ओ-फ़ुग़ान-ए-नीम-शब का फिर पयाम आया थम ऐ रह-रौ के शायद फिर कोई मुश्किल मक़ाम आया ज़रा तक़दीर की गहराइयों में डूब जा तू भी के इस जंगाह से मैं बन के तेग़-ए-बे-नियाम आया ये मिसरा लिख दिया किस शोख़ ने मेहराब-ए-मस्जिद पर ये नादाँ गिर गए सजदों में जब वक़्त-ए-क़याम आया चल ...

अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा

अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा

अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा  अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तेरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं इश्क़ की इक जस्त ...

तिरे इश्क की इंतहा चाहता हूँ

तिरे इश्क की इंतहा चाहता हूँ

तिरे इश्क की इंतहा चाहता हूँ  तिरे इश्क़ की इंतहा चाहता हूँ मिरी सादगी देख, क्या चाहता हूँ सितम हो कि हो वादा-ए-बेहिजाबी  कोई बात सब्र-आज़मा  चाहता हूँ वो जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को कि मैं आपका सामना चाहता हूँ कोई दम का मेहमाँ हूँ ऎ अहले-महफ़िल चिराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ भरी बज़्म में राज़ की ...

वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी

वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी

वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी  वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी मेरे काम कुछ न आया ये कमाल-ए-नै-नवाज़ी मैं कहाँ हूँ तू कहाँ है ये मकाँ के ला-मकाँ है ये जहाँ मेरा जहाँ है के तेरी करिश्मा-साज़ी इसी कशमकश में गुज़रीं मेरी ज़िंदगी की रातें कभी सोज़-ओ-साज़-ए-‘रूमी’ कभी पेच-ओ-ता...

ख़ुदा के बन्दे तो हैं

ख़ुदा के बन्दे तो हैं

ख़ुदा के बन्दे तो हैं हज़ारों बनो‌ में फिरते हैं मारे-मारे ज़माना आया है बेहिजाबी का, आम दीदार-ए-यार होगा सुकूत था परदादार जिसका वो राज़ अब आशकार होगा । गुज़र गया अब वो दौर साक़ी, कि छुप के पीते थे पीने वाले बनेगा सारा जहां मयख़ाना हर कोई बादह्ख़ार होगा कभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ ...

नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी

नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी

नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी  नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शनीदन दास्ताँ मेरी ख़ामोशी गुफ़्तगू है, बेज़ुबानी है ज़बाँ मेरी ये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसी तेरी महफ़िल में यहाँ तो बात करने को तरस्ती है ज़बाँ मेरी उठाये कुछ वरक़ लाला ने कुछ नरगिस ने कुछ गुल ने चमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ता...

हिमाला

हिमाला

हिमाला ऐ हिमाला ऐ फ़सीले किश्वरे-हिन्दोस्ताँ चूमता है तेरी पेशानी को झुककर आसमाँ तुझमें कुछ पैदा नहीं देरीना-रोज़ी के निशाँ तू जवाँ है गर्दिशे-शामो-सहर के दरमियाँ एक जल्वा था कलीमे-तूरे-सीना के लिए तू तजल्ली है सरापा चश्मे-बीना के लिए इम्तिहाने-दीदा-ए-ज़ाहिर में कोहिस्ताँ है तू पासबाँ0 अपना है तू दी...

जमहूरियत

जमहूरियत

जमहूरियत  जमहूरियत इस राज़को इक मर्दे-फ़िरंगी ने किया फ़ाश हरचंद कि दानाइसे खोला नही‍ करते जमहूरियतइक तर्ज़े-हुकूमतहै कि जिसमें बन्दों को गिना करते है‍ तोला नहीं करते

मुहब्बत का जुनूँ बाक़ी नहीं है

मुहब्बत का जुनूँ बाक़ी नहीं है

मुहब्बत का जुनूँ बाक़ी नहीं है  मोहब्बत क जुनूँ बाक़ी नहीं है मुसलमानों में ख़ून बाक़ी नहीं है सफ़ें कज, दिल परेशन, सज्दा बेज़ूक के जज़बा-ए-अंद्रून बाक़ी नहीं है रगों में लहू बाक़ी नहीं है वो दिल, वो आवाज़ बाक़ी नहीं है नमाज़-ओ-रोज़ा-ओ-क़ुर्बानी-ओ-हज ये सब बाक़ी है तू बाक़ी नहीं है

अजब वाइज़ की दींदारी है या रब

अजब वाइज़ की दींदारी है या रब

अजब वाइज़ की दींदारी है या रब  अजब वाइज़ की दीन-दारी है या रब अदावत है इसे सारे जहाँ से कोई अब तक न ये समझा कि इंसाँ कहाँ जाता है आता है कहाँ से वहीं से रात को ज़ुल्मत मिली है चमक तारों ने पाई है जहाँ से हम अपनी दर्दमंदी का फ़साना सुना करते हैं अपने राज़दाँ से बड़ी बारीक हैं वाइज़ की चालें लरज़ जाता...

तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं

तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं

तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं  तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं वो जलवा-गाह तेरे ख़ाक-दाँ से दूर नहीं वो मर्ग़-ज़ार के बीम-ए-ख़िज़ाँ नहीं जिस में ग़मीं न हो के तेरे आशियाँ से दूर नहीं ये है ख़ुलासा-ए-इल्म-ए-क़लंदरी के हयात ख़दंग-ए-जस्ता है लेकिन कमाँ से दूर नहीं फ़ज़ा तेरी मह ओ परवीं से ह...

वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ

वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ

वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ  वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ ख़ुदा मुझे नफ़स-ए-जिब्रईल दे तो कहूँ सितारा क्या मेरी तक़दीर की ख़बर देगा वो ख़ुद फ़राख़ी-ए-अफ़लाक में है ख़्वार ओ ज़ुबूँ हयात क्या है ख़याल ओ नज़र की मजज़ूबी ख़ुदी की मौत है अँदेशा-हा-ए-गूना-गूँ अजब मज़ा है मुझ...

ख़िरदमंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है

ख़िरदमंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है

ख़िरदमंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है  ख़िरदमन्दोंसे क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है कि मैं इस फ़िक्र में रहता हूँ मेरी इंतिहा क्या है ख़ुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बन्दे से ख़ुदपूछे बता तेरी रज़ा क्या है मुक़ामे-गुफ़्तगूक्या है अगर मैं कीमियागर हूँ यही सोज़े-नफ़स ...

परवाना और जुगनू

परवाना और जुगनू

परवाना और जुगनू  परवाना परवाने की मंज़िल से बहुत दूर है जुगनू क्यों आतिशे-बेसूद से मग़रूर है जुगनू जुगनू अल्लाह का सो शुक्र कि परवाना नहीं मैं दरयूज़ागरे-आतिशे-बेगाना नहीं मैं  मेरा गुनाह मुआफ़ मैं भी हाज़िर था वहाँ ज़ब्ते-सुख़न कर न सका हक़ से जब हज़रते- मुल्ला को मिले हुक़्मे-बहिश्त अर्ज़ की मैंने...

अक़्ल ने एक दिन ये दिल

अक़्ल ने एक दिन ये दिल

अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा अक़्ल ने एक दिन ये दिल से कहा भूले-भटके की रहनुमा हूँ मैं दिल ने सुनकर कहा-ये सब सच है पर मुझे भी तो देख क्या हूँ मैं राज़े-हस्ती को तू समझती है और आँखों से देखता हूँ मैं  

ज़मीं-ओ-आसमाँ मुमकिन है

ज़मीं-ओ-आसमाँ मुमकिन है

ज़मीं-ओ-आसमाँ मुमकिन है  मुमकिन है के तु जिसको समझता है बहाराँ औरों की निगाहों में वो मौसम हो ख़िज़ाँ का है सिल-सिला एहवाल का हर लहजा दगरगूँ अए सालेक-रह फ़िक्र न कर सूदो-ज़याँ का शायद के ज़मीँ है वो किसी और जहाँ की तू जिसको समझता है फ़लक अपने जहाँ का

मेरा वतन वही है

मेरा वतन वही है

मेरा वतन वही है  चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे हक़ सुनाया, नानक ने जिस चमन में बदहत का गीत गाया, तातारियों ने जिसको अपना वतन बनाया, जिसने हेजाजियों से दश्ते अरब छुड़ाया, मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥ सारे जहाँ को जिसने इल्मो-हुनर दिया था, यूनानियों को जिसने हैरान कर दिया था, मिट्टी को जिसकी हक़...

अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं

अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं

अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं  अनोखी वज़्अ है सारे ज़माने से निराले हैं ये आशिक़ कौन-सी बस्ती के यारब रहने वाले हैं इलाजे-दर्द में भी दर्द की लज़्ज़त पे मरता हूँ जो थे छालों में काँटे नोक-ए-सोज़ाँ से निकाले हैं फला फूला रहे यारब चमन मेरी उम्मीदों का जिगर का ख़ून दे दे के ये बूटे मैने पाले...

तू अभी रहगुज़र में है

तू अभी रहगुज़र में है

तू अभी रहगुज़र में है  तू अभी रहगुज़र में है क़ैद-ए-मकाम से गुज़र मिस्र-ओ-हिजाज़ से गुज़र, पारेस-ओ-शाम से गुज़र जिस का अमाल है बे-गरज़, उस की जज़ा कुछ और है हूर-ओ-ख़याम से गुज़र, बादा-ओ-जाम से गुज़र गर्चे है दिलकुशा बहोत हुस्न-ए-फ़िरन्ग की बहार तायरेक बुलंद बाल दाना-ओ-दाम से गुज़र कोह शिग़ाफ़ तेरी ज...

सख़्तियाँ करता हूँ दिल

सख़्तियाँ करता हूँ दिल

सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं हाय क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं है मेरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो तू तो इक तस्वीर ह...

ख़ुदा का फ़रमान

ख़ुदा का फ़रमान

ख़ुदा का फ़रमान  उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो ख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो गर्माओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से कुन्जिश्क-ए-फिरोमाया को शाहीं से लड़ा दो सुल्तानी-ए-जमहूर का आता है ज़माना  जो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आये मिटा दो जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी उस ख़ेत के हर ख़...

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए परीशाँ होके मेरी खाक आखिर दिल न बन जाये जो मुश्किल अब हे या रब फिर वही मुश्किल न बन जाये न करदें मुझको मज़बूरे नवा फिरदौस में हूरें मेरा सोज़े दरूं फिर गर्मीए महेफिल न बन जाये कभी छोडी हूई मज़िलभी याद आती है राही को खटक सी है जो सीने में गमें मंज़िल न बन जाय...

अगर कज-रौ हैं अंजुम

अगर कज-रौ हैं अंजुम

अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा अगर कज-रौ हैं अंजुम आसमाँ तेरा है या मेरा मुझे फ़िक्र-ए-जहाँ क्यूँ हो जहाँ तेरा है या मेरा अगर हँगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली ख़ता किस की है या रब ला-मकाँ तेरा है या मेरा उसे सुब्ह-ए-अज़ल इंकार की जुरअत हुई क्यूँकर मुझे मालूम क्या वो राज़-दाँ तेरा है य...

जवाब-ए-शिकवा

जवाब-ए-शिकवा

जवाब-ए-शिकवा दिल से जो बात निकलती है असर रखती है । पर नहीं, ताकत-ए-परवाज़ मगर रखती है । क़दसी अलासल है, रफ़ात पे नज़र रखती है । ख़ाक से से उठती है गर्दू पे गुज़र रखती है । इश्क था फ़ितनागर व सरकश व चालाक मेरा । आसमान चीर गया नाला-ए-बेबाक मेरा । पीर ए गरदू ने कहा सुन के, कहीं है कोई बोले सयादे, रस अर...

मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में

मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में

मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में  मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में ग़ुलग़ुला-हा-ए-अल-अमाँ बुत-कदा-ए-सिफ़ात में हूर ओ फ़रिश्ता हैं असीर मेरे तख़य्युलात में मेरी निगाह से ख़लल तेरी तजल्लियात में गरचे है मेरी जुस्तुजू दैर ओ हरम की नक़्श-बंद मेरी फ़ुग़ाँ से रुस्तख़ेज़ काबा ओ सोमनात में गाह म...

असर करे न करे सुन तो ले

असर करे न करे सुन तो ले

असर करे न करे सुन तो ले मेरी फ़रियाद असर करे न करे सुन तो ले मेरी फ़रियाद नहीं है दाद का तालिब ये बंद-ए-आज़ाद ये मुश्त-ए-ख़ाक ये सरसर ये वुसअत-ए-अफ़लाक करम है या के सितम तेरी लज़्ज़त-ए-ईजाद ठहर सका न हवा-ए-चमन में ख़ेम-ए-गुल यही है फ़स्ल-ए-बहारी यही है बाद-ए-मुराद क़ुसूर-वार ग़रीब-उद-दयार हूँ लेकिन ...

तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ

तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ

तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ  तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ सितम हो कि हो वादा-ए-बेहिजाबी कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को कि मैं आप का सामना चाहता हूँ कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल चिराग़-ए-सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ भरी बज़्म में राज़...

सच कह दूँ ऐ ब्रह्मन गर तू बुरा न माने

सच कह दूँ ऐ ब्रह्मन गर तू बुरा न माने

सच कह दूँ ऐ ब्रह्मन गर तू बुरा न माने  सच कह दूँ ऐ ब्रह्मन गर तू बुरा न माने तेरे सनम कदों के बुत हो गये पुराने अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा जन्ग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने तन्ग आके आख़िर मैं ने दैर-ओ-हरम को छोड़ा वाइज़ का वाज़ छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने पत्थर की मूरतों में समझा है तू ...

ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र ओ नाज़ नहीं

ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र ओ नाज़ नहीं

ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र ओ नाज़ नहीं  ख़ुदी की शोख़ी ओ तुंदी में किब्र ओ नाज़ नहीं जे नाज़ हो भी तो बे-लज़्ज़त-ए-नियाज नहीं निगाह-ए-इश्क़ दिल-ए-ज़िंदा की तलाश में है शिकार-ए-मुर्दा साज़-वार-ए-शहबाज़ नहीं मेरी नवा में नहीं है अदा-ए-महबूबी के बाँग-ए-सूर-ए-सराफ़ील दिल-नवाज़ नहीं सवाल-ए-मै न करू...

परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए

परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए

परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए  परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए जो मुश्किल अब है या रब फिर वही मुश्किल न बन जाए न कर दें मुझ को मजबूर-ए-नवाँ फ़िर्दौस में हूरें मेरा सोज़-ए-दुरूँ फिर गर्मी-ए-महफ़िल न बन जाए कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मं...

ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी

ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी

ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी  ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी न छूटे मुझ से लंदन में भी आदाब-ए-सहर-ख़ेज़ी कहीं सरमाया-ए-महफ़िल थी मेरी गर्म-गुफ़्तारी कहीं सब को परेशाँ कर गई मेरी कम-आमेज़ी ज़माम-ए-कार अगर मज़दूर के हाथों में हो फिर क्या तरीक़-ए-कोहकन में भी वही हीले हैं परवेज़...

मेरी निगाह में है मोजज़ात की दुनिया

मेरी निगाह में है मोजज़ात की दुनिया

मेरी निगाह में है मोजज़ात की दुनिया  मेरी निगाह में है मोजज़ातकी दुनिया मेरी निगाह में है हादिसातकी दुनिया तख़ैयुलात की दुनिया ग़रीब है लेकिन ग़रीबतर है हयातो-मुमात  की दुनिया अजब नहीं कि बदल दे तुझे निगाह तेरी बुला रही है तुझे मुमकिनात की दुनिया

आम मशरिक़ के मुसलमानों

आम मशरिक़ के मुसलमानों

आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका है आम मशरिक़ के मुसलमानों का दिल मगरिब में जा अटका है वहाँ कुंतर सब बिल्लोरी है, यहाँ एक पुराना मटका है इस दौर में सब मिट जायेंगे, हाँ बाक़ी वो रह जायेगा जो क़ायम अपनी राह पे है, और पक्का अपनी हट का हे अए शैख़-ओ-ब्रह्मन सुनते हो क्या अह्ल-ए-बसीरत कहते ...

दयारे-इश्क़ में अपना मुक़ाम पैदा कर

दयारे-इश्क़ में अपना मुक़ाम पैदा कर

दयारे-इश्क़ में अपना मुक़ाम पैदा कर  अपने पुत्र के लिए लंदन से भेजा गया उनका पहला ख़त दयारे-इश्क़ में अपना मुक़ाम पैदा कर नया ज़माना नए सुब्ह-ओ-शाम पैदा कर ख़ुदा अगर दिले-फ़ितरत-शनास  दे तुझको सुकूते-लाल-ओ-गुल से कलाम पैदा कर उठा न शीशा-गराने-फ़िरंग के अहसाँ  सिफ़ाले-हिन्द से मीना-ओ-जाम पैदा कर  मैं...

साक़ी

साक़ी

साक़ी  नशा पिला के गिराना तो सबको आता है, मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी। जो बादाकश थे पुराने वे उठते जाते हैं कहीं से आबे-बक़ाए-दवाम ले साक़ी। कटी है रात तो हंगामा-गुस्तरीं में तेरी, सहर क़रीब है अल्लाह का नम ले साक़ी।

ख़ुदी में डूबने वालों

ख़ुदी में डूबने वालों

ख़ुदी में डूबने वालों   जहाने-ताज़ा की अफ़कारे-ताज़ा से है नमूद कि संगो-ख़िश्त से होते नहीं जहाँ पैदा ख़ुदी में डूबने वालों के अज़्मो-हिम्मत ने इस आबे-जूसे किए बह्रे-बेकराँपैदा    

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर  फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर तस्ख़ीर-ए-मक़ाम-ए-रंग-ओ-बू कर तू अपनी ख़ुदी को खो चुका है खोई हुई शै की जुस्तुजू कर तारों की फ़ज़ा है बे-कराना तू भी ये मक़ाम-ए-आरज़ू कर उरियाँ हैं तेरे चमन की हूरें चाक-ए-गुल-ओ-लाला को रफ़ू कर बे-ज़ौक़ नहीं अगरचे फ़ितरत जो उस से न हो सका ...

जिस खेत से दहक़ाँ को

जिस खेत से दहक़ाँ को

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी उट्ठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो ख़ाक-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो गरमाओ ग़ुलामों का लहू सोज़-ए-यक़ीं से कुन्जिश्क-ए-फिरोमाया को शाहीं से लड़ा दो सुल्तानी-ए-जमहूर का आता है ज़माना जो नक़्श-ए-कुहन तुम को नज़र आये मिटा दो जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रो...

ये पयाम दे गई है मुझे

ये पयाम दे गई है मुझे

ये पयाम दे गई है मुझे  ये पयाम दे गई है मुझे बादे- सुबहशाही कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मक़ाम पादशाही तेरी ज़िंदगी इसी से, तेरी आबरू इसी से जो रही ख़ुदी तो शाही, न रही तो रूसियाही न दिया निशाने-मंज़िल, मुझे ऎ हकीम तूने मुझे क्या गिलस हो तुझ्से, तू न रहनशीं न राही शब्दार्थ : बादे- सुबहशाही= सुबह की हवा...

आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना

आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना

आता है याद मुझ को गुज़रा हुआ ज़माना  आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना वो बाग़ की बहारें, वो सब का चह-चहाना आज़ादियाँ कहाँ वो, अब अपने घोसले की अपनी ख़ुशी से आना अपनी ख़ुशी से जाना लगती हो चोट दिल पर, आता है याद जिस दम शबनम के आँसुओं पर कलियों का मुस्कुराना वो प्यारी-प्यारी सूरत, वो कामिनी-सी मूरत ...

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है  दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है फिर इस में अजब क्या के तू बे-बाक नहीं है है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिंहाँ ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है वो आँख के है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन पुर-कार ओ सुख़न-साज़ है नम-नाक नहीं है क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर...

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा  सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा  ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा  परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा  गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों...

गुलज़ारे-हस्ती-बूद न बेगानावार देख

गुलज़ारे-हस्ती-बूद न बेगानावार देख

गुलज़ारे-हस्ती-बूद न बेगानावार देख  गुलज़ारे-हस्ती-बूद न बेगानावार देख है देखने की चीज़, इसे बार-बार देख आया है तू जहाँ में मिसाले-शरार देख दम दे न जाए हस्ती-ए-नापायादार देख माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख, मेरा इंतिज़ार देख शब्दार्थ : गुलज़ारे-हस्ती-बूद न बेगानावार देख=जीवन...

फिर चराग़े-लाला से रौशन

फिर चराग़े-लाला से रौशन

फिर चराग़े-लाला से रौशन हुए कोहो-दमन फिर चराग़े-लाला से रौशन हुए कोहो-दमन मुझको फिर नग़्मों पे उकसाने लगा मुर्ग़े-चमन फूल हैं सहरा में या परियाँ क़तार अन्दर क़तार ऊदे-ऊदे, नीले-नीले पीले-पीले पैरहन बर्गे-गुल पर रख गई शबनम का मोती बादे-सुब्ह और चमकाती है उस मोती को सूरज की किरन हुस्ने-बेपरवा को अपनी ...

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में  जिन्हें मैं ढूँढता था आस्मानों में ज़मीनों में वो निकले मेरे ज़ुल्मतख़ाना-ए-दिल के मकीनोंमें अगर कुछ आशना होता मज़ाक़े- जिबहसाई  से तो संगे-आस्ताने-काबा जा मिलता जबीनों से कभी अपना भी नज़्ज़ारा किया है तूने ऐ मजनूँ ! कि लैला की तरह तू भी तो है महमिलनशीन...

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी  लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी ज़िन्दगी शमअ की सूरत हो ख़ुदाया मेरी दूर दुनिया का मेरे दम अँधेरा हो जाये हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत  जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब इल्म की...

उक़ाबी शान से झपटे थे जो

उक़ाबी शान से झपटे थे जो

उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले उक़ाबीशान से झपटे थे जो बे-बालो-परनिकले सितारे शाम को ख़ूने-फ़लक़में डूबकर निकले हुए मदफ़ूने-दरियाज़ेरे-दरियातैरने वाले तमाँचेमौज के खाते थे जो बनकर गुहर निकले ग़ुबारे-रहगुज़रहैं कीमिया0पर नाज़ था जिनको जबीनेंख़ाक पर रखते थे जो अक्सीरगर निकले हमारा नर्म-रौ क...

न आते हमें इसमें तकरार क्या थी

न आते हमें इसमें तकरार क्या थी

न आते हमें इसमें तकरार क्या थी  न आते हमें इसमें तकरार क्या थी मगर वादा करते हुए आरक्या थी तुम्हारे पयामी ने ख़ुद राज़ खोला ख़ता इसमें बन्दे की सरकार क्या थी? भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा तिरी आँख मस्ती में हुशियार क्या थी तअम्मुल तो था उनको आने में क़ासिद  मगर ये बता तर्ज़े-इन्कार क्या थी? खिं...

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं  सितारों के आगे जहाँ और भी हैं अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं तही ज़िन्दगी से नहीं ये फ़ज़ायें यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं क़ना’अतन कर आलम-ए-रंग-ओ-बूपर चमन और भी, आशियाँऔर भी हैं अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँऔर भी हैं तू शाहींहै परवाज़ह...

गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बू न बेगानावार देख

गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बू न बेगानावार देख

गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बू न बेगानावार देख  गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बू न बेगानावार देख है देखने की चीज़ इसे बार बार देख आया है तो जहाँ में मिसाल-ए-शरर देख दम दे नजये हस्ती-ए-नापायेदार देख माना के तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मेरा इंतज़ार देख खोली हैं ज़ौक़-ए-दीद ने आँखें तेरी तो फिर हर रहगुज़र...

बच्चों की दुआ

बच्चों की दुआ

बच्चों की दुआ  लब पे’ आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी, ज़िन्दगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी । दूर दुनिया का मेरे दम से अंधेरा हो जाए हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए । हो मेरे दम से यूँ ही वतन की ज़ीनत, जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत । ज़िन्दगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब ! इल्म की शमा से ...

  • 1
  • 2