रुबाईयां

रुबाईयां

1
वो पल मेरी हस्ती जब बन गया दरया
चमक उठ्ठा हर ज़र्रा होके रौशन मेरा
बन के शमा जलता हूँ रहे इश्क पर मैं
बस लम्हा एक बन गया सफ़रे उम्र मेरा

2
हूँ वक्त के पीछे और कोई साथ नहीं
और दूर तक कोई किनारा भी नहीं
घटा है रात है कश्ती मैं खे रहा
पर वो खुदा रहीम बिना फज्ल के नहीं

3
पहले तो हम पे फरमाये हज़ारों करम
बाद में दे दिए हज़ारों दर्द ओ ग़म
बिसाते इश्क पर घुमाया खूब हमको
कर दिया दूर जब खुद को खो चुके हम

4
ऐ दोस्त तेरी दोस्ती में साथ आए हैं हम
तेरे कदमों के नीचे बन गए ख़ाक हैं हम
मज़्हबे आशिकी में कैसे ये वाजिब है
देखें तेरा आलम व तुझे न देख पाएं हम

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