मैकदे में आज

मैकदे में आज

नशे से बैठे हैं रिन्दो जैसे मैकदे में आज
ज़हद न करेंगे और न नमाज़ पढ़ेंगे आज

क्या बोलूं क्या महफ़िल क्या मय है आज
क्या साक़ी, क्या मेहरबानी, क्या लुत्फ़ आज

ना हिज्र का कोई निशान है, ना बू है
दिलदार से मेल और विसाल है आज

आज मिलते तोहफ़े और चुम्मे साक़ी से
प्याले हैं, मस्तियां हैं, और शराबें हैं आज

आज मस्ती में जानूँ ना सुबह से शाम
गुज़र रहे हैं ज़माने लम्हों की तरह आज

जल पड़े हैं आज़ फ़ित्ने में लग कर सभी
इस आँगन की मजलिस में हाय व हू है आज

ख़ुद से निकल कर पूजते हैं सभी शराब को
साक़ी के देखे बिन हम पर होती नहीं करामात

शम्सुद्दीन तबरेज़ी ने की न कोई खुराफात
तौहीद की मय ढाल सब यारों को दी आवाज़
(रिन्द-पक्का शराबी, हिज्र-जुदाई, फ़ित्ने-दंगे,हंगामे,
मजलिस-सभा, तौहीद-अद्वैत)

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