मूल के मूल में आ

मूल के मूल में आ

कब तलक उलटा चलेगा, अब सीधे आ
छोड़ कुफ़्र की राह, अब चल दीन की राह
इस डंक में देख दवा, और डंक खा
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

हरचंद है तू इस मिट्टी का ही बना
सच के मोती के धागों से अन्दर बुना
ख़ुदाई नूर का ख़ज़ांची तुझको चुना
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

बेखुदी से जब तू खुद को बाँध लेगा
तो जान कि खुदी की क़ैद से खुलेगा
और हज़ार बन्धन तोड़ तू उड़ चलेगा
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

ख़लीफ़ा की पुश्त से तू पैदा हुआ है
पसरे इस खोटे जहाँ को देखता है
लानत तू इतने पर ही खुश घूमता है
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

हरचंद इस जहाँ का तावीज़ है तू
अन्दर छिपे ख़ज़ानों की ख़ान है तू
झाँक अपनी छिपी आँखें खोल के तू
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

ख़ुदा के जलाल से भर कर तू पैदा हुआ है
सितारे और सगुन नेक भी बरपा हुआ है
वो है ही नहीं जिसे तू रो गा रहा है
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

सारे पत्थर में जड़ा तू है एक मानिक
करेगा कब तक धोखा हमारी जानिब
हुआ जा रहा आँखों से सब ज़ाहिर
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

सरकश यार के पास से आये हो तुम
पीकर मस्त फिर भी नाज़ुक और दिलकश
आँखों में खुश हो और दिल में आतिश
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

शम्स तबरेज़ी हैं हमारे शाह और साक़ी
दे दिया हमारे हाथों में जामे बाक़ी
सुबहान अल्ला ख़ालिस ये शराब जा पी
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ
(कुल्लियाते दीवाने शम्स तबरेज़ी में ग़ज़ल संख्या 12,
डंक खा-चूंकि जो ईश्वर की राह की चीज़ें हैं वो पहले
बुरी, दुखद और कड़वी लगती हैं, इसलिए उसकी उपमा
डंक से की है, सच-ईश्वर, या अस्तित्व के वास्तविक
स्वरूप, ख़लीफ़ा-प्रतिनिधि, यहाँ आशय उन आदम से है
जो धरती पर ईश्वर के ख़लीफ़ा हैं, और मनुष्यता जिनकी
सन्तान है, बाक़ी-अनन्त अनस्तित्व के जीवन का ज्ञान)

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