मुरली का गीत

मुरली का गीत

(मसनवी की पहली किताब की शुरुआत
इसी मुरली के गीत से होती है)

सुनो ये मुरली कैसी करती है शिकायत ।
हैं दूर जो पी से, उनकी करती है हिकायत ॥

काट के लाये मुझे, जिस रोज़ वन से ।
सुन रोए मरदोज़न, मेरे सुर के ग़म से ॥

खोजता हूँ एक सीना फुरक़त से ज़र्द-ज़र्द ।
कर दूँ बयान उस पर अपनी प्यास का दर्द ॥

कर दिया जिसको वक़्त ने अपनों से दूर ।
करे दुआ हर दम यही, वापसी होय मन्ज़ूर ॥

मेरी फ़रियाद की तान हर मजलिस में होती है ।
बदहाली मे होती है और खुशहाली में होती है ॥

बस अपने मन की सुनता समझता हर कोई ।
क्या है छिपा मेरे दिल मे, जानता नहीं कोई ॥

राज़ मेरा फ़रियादों से मेरी, अलग़ तो नही ।
ऑंख से, कान से ये खुलता मगर जो नहीं ॥

तन से जान और जान से तन छिपा नहीं है ।
किसी ने भी मग़र जान को देखा नहीं है ॥

हवा है तान मे मुरली की ? नहीं सब आग है ।
जिसमें नहीं ये आग, वो तो मुर्दाबाद है ॥

मुरली के अन्दर आग आशिक की होती है ।
आशिक की ही तेज़ी मय में भी होती है ॥

हो गई मुरली उसी की यार, पाई जिसमें पीर ।
दे दिया उनको सहारा, कर मेरा पर्दा चीर ॥

मुरली सा ज़हर भी दवा भी, किसने देखा है ।
हमदर्द सच्चा मुरली जैसा किसने देखा है ॥

खूं से भरी राहों से मुरली आग़ाज़ करती है ।
रूदाद गाढ़े इश्क की मजनूं की कहती है ॥

होश से अन्जान वो सब, जो बेहोश नहीं है ।
इस आवाज़ को जाने वो क्या, जिसे कान नहीं है ॥

दर्द ऐसा मिला जो है हर वक्त मेरे साथ ।
वक्त ऐसा मिला, हर लम्हा तपिश के साथ ॥

बीते जा रहे ये दिन यूँ ही, कोई बात नहीं ।
तू बने रहना यूँ ही, तुझ सा कोई पाक नहीं ॥

जो मछली थे नहीं, पानी से सब थक गये ।
लाचार थे जो, दिन उनके जैसे थम गये ॥

न समझेंगे जो कच्चे हैं, पकना किसको कहते हैं ।
नहीं ये राज़ गूदे के, छिलका इसको कहते हैं ॥

तो हो आज़ाद ऐ बच्चे, क़ैदों से दरारों की ।
रहोगे बन्द कब तक, चॉंदी में दीवारों की ॥

सागर को भरोगे गागर में, कितना आएगा ?
उमर में एक दिन जितना भी न आएगा ॥

भरो लोभ का गागर, कभी भर पाओगे नहीं ।
खुद को भरता मोतियों से, सीप पाओगे नहीं ॥

कर दिया जिसका ग़रेबां इश्क ने हो चाक ।
लोभ लालच की बुराई से, हो गया वो पाक ॥

अय इश्क तू खुशबाश हो और ज़िन्दाबाद हो ।
हमारी सब बीमारी का बस तुझसे इलाज हो ॥

तू है दवा ग़ुमान की और है ग़ुरूर की ।
तुझसे ही क़ायम है लौ, खिरद के नूर की ॥

ये खाक का तन अर्श तक, जाता है इश्क़ से ।
ख़ाक का परबत भी झूमता गाता है इश्क़ से ॥

आशिको इस इश्क ने ही जान दी कोहे तूर में ।
था तूर मस्ती में, व थी ग़शी मूसा हुज़ूर में ॥

लबे-सुर्ख के यार से ग़रचे मुझे चूमा जाता ।
मुझसे भी मुरली सा शीरीं सुर बाहर आता ॥

दूर कोई रहता हमज़बानो से जो हो ।
बस हो गया गूँगा, सौ ज़बां वाक़िफ़ वो हो ॥

चूँकि गुल अब है नही वीरां बगीचा हो गया ।
बाद गुल के, बन्द गाना बुलबुलों का हो गया ॥

माशूक़ ही है सब कुछ, आशिक़ है बस पर्दा ।
माशूक ही बस जी रहा है, आशिक़ तो एक मुर्दा ॥

ऐसा न हो आशिक़ तो इश्क़ का क्या हाल हो ।
परिन्दा वो इक जिसके गिर गए सब बाल हो ॥

होश में कैसे रहूँ मैं, बड़ी मुश्किल में हूँ ।
यार को देखे बिना, हर घड़ी मुश्किल में हूँ ॥

अरमान है इश्क का, इस राज़ को दुनिया से बोले ।
मुमकिन हो ये किस तरह, आईना जब सच न खोले ॥

सच बोलता आईना तेरा, सोच क्यूँ नहीं ?
चेहरा उसका ज़ंग से, जो साफ है नहीं ॥
(हिकायत-कहानी, फ़ुरक़त-विरह, ज़र्द-पीला,
मजलिस-सभा, आग़ाज़-शुरुआत, चाक-विदीर्ण,
फटा हुआ, खिरद-अक़ल,बुद्धि, अर्श-आसमान,
कोहे तूर-तूर नाम का पर्वत, जिस पर मूसा
को खुदाई नूर के दर्शन हुए, ग़शी-बेहोशी,
शीरीं-मीठा, वाक़िफ़-जानकार, बाल-पर,डैने)

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