पहाड़

पहाड़

पहाड़ की गूंज ख़ुद से आगाह नहीं है
पहाड़ की अक़ल को रूह से राह नहीं है

बेकान व बेहोश वो बस आवाज़ करता है
जब तुम चुप हो गए, वो भी चुप करता है

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