गुलाबी गाल तेरे

गुलाबी गाल तेरे

गुलाबी गाल तेरे जब देख पाते हैं
होके खुशगवार पत्थरों में राह पाते हैं

इक बार घूँघट ज़रा फिर से हटा दो
दंग होने का दीवानों को मज़ा दो

ताकि आलिम समझी-बूझी राह भूलें
हुशियारों की अक़ल की हिल जाएँ चूलें

पानी बन जाय मोती, तुम्हारा अक्स पड़ना
ताकि आतिश छोड़ दे जलना, जंग करना

तुम्हारे हुस्न के आगे चाँद से मुँह मोड़ लूँ
जन्नत की झिलमिलाती रौशनियां छोड़ दूँ

तुम्हारे चेहरे के आगे न बोलूं – आईना है
ये बूढ़ा आसमां तो जंग जैसे खा गया है

इस जहाँ में सांस तुमने फूँक दी है
इस बेचारे को नई एक शकल दी है

ऐ उशना साज़ में कुछ तान लाओ
पैनी आँखों के लिए कुछ ख़ाहिश जगाओ
(कुल्लियाते दीवाने शम्स तबरेज़ी में ग़ज़ल संख्या 171,
सांस तुमने फूँक दी है-अल्ला ने अपने दम (सांस) से
दुनिया बनाई, कहा कुन (हो जा), और सब हो गया,
उशना-शुक्र ग्रह; शुक्र ग्रह का संगीत से सीधा सम्बन्ध
है तो एक तो स्पष्ट अर्थ है ही, दूसरे ब्रह्माण्ड की सूफ़ी
कल्पना के अनुसार शुक्र देवदूतों का निवास स्थान है,
और विकसित मनुष्य, इन्सानुल कामिल का अगला
मक़ाम फरिश्ते हैं इसलिए शायद रूमी ने शम्स या
सलाहुद्दीन को उशना के नाम से सम्बोधित किया है)

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